Tuesday, May 8, 2012

सेहत के हैं ये राजदार

पं. महेश शर्मा 

रुटीन लाइफ में आप हर रोज कुछ ऐसे खाद्य पदार्थों का उपयोग करते हैं जो आपके स्वास्थ्य के लिए काफी लाभकारी होते हैं, लेकिन लोगों को यह पता नहीं होता है कि उसका उपयोग वह क्यों करते हैँ?

 गाजर : गाजर के गुणों से सभी वाकिफ हैं। इसे गोल काटने पर यह बिल्कुल मनुष्य की आंख की तरह दिखती है। बीच के हिस्से को ध्यान से देखने पर यह आंख की पुतली की आकृति की तरह नजर आएगी। इसके सेवन से रक्त की कमी को दूर किया जाता है। साथ ही आंखों की रोशनी के लिए फायदेमंद होती है।

टमाटर : यह लाल रंग का होता है और इसमें चार कक्ष होते हैं। मनुष्य के दिल में भी चार कक्ष होते हैं और यह भी लाल होता है। विभिन्न शोधों में बताया गया है कि इसमें लाइकोपीन पाया जाता है। यह दिल के मरीजों के लिए लाभदायक होता है।

अंगूर : यह दिल के आकार में गुच्छे में लटकने वाला फल है। हर अंगूर रक्त कोशिका की तरह दिखता है। इसके सेवन से खून की मात्रा बढ़ती है।

अखरोट : अखरोट के बीच का हिस्सा छोटे से दिमाग की तरह दिखता है। इसकी सिलवटें नियो कारटेक्स की तरह दिखती हैं। नियो कारटेक्स स्तनधारियों के मस्तिष्क का हिस्सा है। यह मस्तिष्क के कार्य के लिए तीन दर्जन से ज्यादा न्यूरान ट्रांसमीटर विकसित करता है। टमाटर के सेवन से शारीरिक और मानसिक विकास अच्छा होता है।

सैलेरी : यह हड्डी की तरह दिखने के साथ उसकी ताकत को बढ़ाने का काम करती है। हड्डी में 30 प्रतिशत सोडियम होता है। इनमें भी यही मात्रा पाई जाती है। अगर आपके खाने में ज्यादा सोडियम नहीं है, तो शरीर की हड्डियों में खिंचाव आ जाता है और यह कमजोर हो जाती हैं। इसके सेवन से हड्डियों की जरूरतें पूरी होती हैं।

एवाकेडो : बैगन और नाशपाती. आकार के हिसाब से यह गर्भ और महिला के गर्भाशय ग्रीवा की तरह दिखते हैं। हाल के शोधों में यह बात निकलकर आई है कि कोई महिला हफ्ते में एक बार एवाकेडो खाती है तो उसका हार्मोस संतुलित रहता है और सरवाइकल कैंसर से बचाव होता है। एक औरत को मां बनने में नौ महीने का समय लगता है। इतना ही समय एवाकेडो को कली से फल पकने तक में लगता है।

अंजीर : यह बीज से भरा फल होता है। पेड़ पर इसके दो फल एक साथ बढ़ते हैं। यह पुरुषों के शुœाणुओं की गतिशीलता के साथ उसकी संख्या को बढ़ाते हैं।

आलू : यह पैंœियाज अग्नाश्य की तरह दिखता है। यह डायबिटिज के मरीजों में ग्लूकोज के स्तर के अनुरूप कार्बोहाइड्रेट बनाता है।

ओलिव जैतून : यह दिखने में अंडाशय की तरह होता है। इसका सेवन भी स्वास्थ्य और अंडाशय के लिए उपयोगी होता है।

संतरा : आम तौर पर खत्र्े फल महिलाओं के स्तन की भांति दिखते हैं। यह वास्तव में स्तनों के स्वास्थ्य के लाभकारी होता है।

प्याज : यह शरीर की कोशिकाओं की तरह दिखता है। हाल ही में शोध में यह बताया गया है कि प्याज शरीर की कोशिकाओं से अपशिष्ट पदार्थो को बाहर निकालती है। इनको काटने पर आंखों में आंसू आ जाते हैं, जो आंखों की ऊपरी परत एपीथेलियल लेयर को धो देती है। इसका साथी लहसुन भी अपशिष्ट पदार्थो को बाहर निकालने का

बना रहे रिश्तों में प्यार

पं. महेश शर्मा 

क्या आपने कभी यूं ही एकांत क्षणों में स्नेह से साथी की बांह पकडी और खुद के भीतर एक

पवित्र सी स्नेह भावना महसूस की। गहरी उदासी भरे पलों में पति ने आपके माथे पर प्यार भरा

एक चुंबन दिया और आपको लगा मानो एक पल में ही सारा तनाव खत्म हो गया। रोते बच्चे को

मां ने प्यार से दुलारा और उसके आंसू थम गए। हॉस्पिटल के बेड पर पडे मरीज की हथेलियों पर

डॉक्टर ने हौले से अपनी हथेलियों का स्पर्श दिया और वह कष्ट में भी मुस्करा उठा।


क्या है स्पर्श


हम सभी स्पर्श की भाषा समझते हैं। अक्सर किसी से मिलते समय हम उससे हाथ मिलाते हैं।

इससे संबंधों में एक गर्मजोशी का एहसास होता है। आमतौर पर किसी से दोबारा मिलने के लिए

हमारा प्रिय वाक्य होता है कीप इन टच। चिज्ञ्ी में संबोधन के बाद सबसे पहले शब्द होते हैं

बडों को चरण स्पर्श और छोटों को स्नेह व प्यार भरा आशीष। हम डॉक्टर से हीलिंग टच के

बारे में बात करते हैं। अपने छोटे बच्चों को अच्छे और बुरे स्पर्श में फर्क करना सिखाते हैं।

सार्वजनिक स्थलों पर हम सभी दूसरों से अपेक्षित फासला रखना बेहतर समझते हैं। कोशिश

करते हैं कि गलती से भी किसी को छू न लें। क्योंकि इसका संदेश विपरीत भी जा सकता है। इन

सबके बीच हम एक बेहद बुनियादी सी बात भूल जाते हैं। वह है स्वस्थ मानवीय स्पर्श। समाज

में, परिवार मे, किसी से बातचीत में, हम इस स्पर्श की मक भाषा को व्यक्त करना भूल ही जाते

हैं।


जादू की झप्पी का महत्व

मां का भरपूर स्पर्श पाने वाले बच्चे का विकास अपेक्षाकृत तेज गति से होता है। जबकि ऐसे

बच्चे बीमार एवं कमजोर होते हैं, जिन्हें मां का प्यार नहीं मिल पाता।

स्पर्श महज मनुष्य जाति की ही भावना नहीं है, बेजुबान जानवरों को भी यह भाषा समझ आती

है। शोध तो यहां तक कहते हैं कि जिन पालतू जानवरों को ज्यादा प्यार मिलता है, वे औरों से

ज्यादा स्वस्थ होते हैं।


मानवीय संबंधों में स्पर्श का बहुत महत्व है। दुख के पलों में दोस्त सांत्वना देते हुए कंधे पर

हाथ रखता है और बिना बोले कह देता है मैं हंू न। फिल्म मुन्ना भाई एमबीबीएस में यह स्पर्श

मरीजों को जादू की झप्पी देने लगता है।


सांस लेने जितना जरूरी है स्पर्श


आज के युग में जहां लोगों के पास समय की कमी है, स्पर्श का महत्व और बढ गया है। शायद

यही कारण है कि हीलिंग टच थेरेपी की मांग लगातार बढ रही है। पार्लर में फेशियलए स्पा या

बॉडी मसाज कराना हो या रेकीए एक्यूप्रेशर या एक्यूपंचर जैसी वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों

से शरीर मन को स्वस्थ रखना होए स्पर्श ही इनके केंद्र में काम करता है। इसलिए वैज्ञानिक

अब स्पर्श को जिंदा रहने के लिए जरूरी मानने लगे हैं।


शब्दों से परे भावनाओं से भरे स्पर्श के बारे में इतना ही कहना काफी है कि जहां शब्द चुक जाते

हैं, स्पर्श बोलता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी कमी से न सिर्फ भावनाएं आहत होती

हैं, बल्कि दांपत्य में सेक्स भावनाएं भी कम होने लगती हैं। रोग प्रतिरोधक क्षमता पर भी

इसका प्रभाव पडता है।


मानव शरीर त्वचा के सुरक्षित खोल के भीतर समाया हुआ है, जिसमें हर एक इंच में हजारों

स्नायु और संवेदन तंत्रिकाएं मौजूद होती हैं। ये मस्तिष्क को आसपास होने वाली घटनाओं की

सूचना भेजती हैं। मसलन बर्फ पर हाथ रखते ही ठंड का एहसास होना आग पर हथेली पडते ही

त्वचा में जलन का अनुभव होना जैसे तमाम काम स्नायु तंत्र के ही हैं।

Tuesday, April 24, 2012

सुखद दांपत्य

पं. महेश शर्मा 

वैवाहिक जीवन की जटिलता को समझना मुश्किल है। बहुत से ऐसे कारण पैदा हो जाते हैं जो मनमुटाव का कारण बनते हैं। लेकिन सुखी दांपत्य जीवन के उपाय जरूर किए जा सकते हैं।

हर युवती जीवन साथी का चयन करते समय इस बात का खास ध्यान रखती है कि वह आकर्षक और सुंदर तो हो ही, सुशिक्षित और सभ्य भी हो। इसी तरह हर युवक की भी ऐसी ही इच्छा होती है। घर को सुघड़ गृहणी की तरह संभालने का गुण और नौकरी पेशा युवती मिल जाए तो ऐसा संबंध सोने में सुहागा माना जाता है। पर ऐसा क्या हो जाता है कि अकसर कुछ सालों बाद यही गुण खीझ पैदा करने वाले लगने लगते ह। कुढ़न की भावना पनपने लगती है जो समय के साथ उग्र ज्वालामुखी का रूप ले लेती है। अंतत: संबंधों में दरारें आने लगती हैं। कोई युवती पति का चयन करते समय इस बात का ध्यान रखती है कि वह आकर्षक और प्रभावशाली तो हो ही करिअर में सफल, प्रेम से परिपूर्ण भी हो। कुछ ही दिन बाद सोच बदल जाती है और मामूली बातों पर टकराव पनपने लगता है।

खासकर कामकाजी दंपति के बीच धन और सम्पत्ति पर नियंत्रण का प्रयास खतरनाक टकराव में बदल जाता है। तर्क-वितर्क और कुतर्क का परिणाम यह होता है कि सात जन्मों के वादा बंधन में बंधे पति-पत्नी के बीच दीवार खड़ी हो जाती है। आज हर तरफ यौन उन्मुक्तता का माहौल है। यह वर्जित विषय नहीं रह गया है। पर यह जीवन को अत्यंत त्रासद भी बना देता है। ऐसे मामलों में संघर्ष के दिनों में तो दोनों एक-दूसरे की लक्ष्य प्राप्ति में सहायक बनते हैं पर अचानक एक का करिअर उड़ान भरने लगता है और दूसरा नीचे खड़ा मायूस रह जाता है। यही मायूसी ईष्र्या का कारण बनती है और कई बार अलगाव भी पैदा कर देती है।

वफादारी, प्रेम, खुशी, विश्वास और समर्पण की भावना के विपरीत अगर शक, अविश्वास, कड़वाहट, कुढ़न, जीवनसाथी की उपेक्षा, रूखा व्यवहार हावी हो जाए तो तो रिश्तों को ढोने की जगह अलग हो जाने का विकल्प चुनने में कोई एक ज्यादा देर नहीं लगाता। अधिसंख्य दांपत्य केवल इसलिए तबाह हो जाता है क्योंकि जीवनसाथी एक-दूसरे पर पागलपन की हद तक नियंत्रण चाहते है। अहं का युद्ध छिड़ जाए, ईष्र्या बनी रहे, एक-दूसरे की जड़ें काटने की कोशिश होती रहे तो दांपत्य जीवन निश्चित ही नर्क बन जाता है। कभी कभी मिश्रित वरीयताओं के कारण दांपत्य जीवन का आकर्षण भी धुंधला जाता है। एक-दूसरे के प्रति घटिया भाषा का इस्तेमाल, अपमान, अविश्वास और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृति खतरनाक परिस्थिति है और कई बार इससे उबरना बहुत मुश्किल होता है। गैर जरूरी हस्तक्षेप भी मनमुटाव बढ़ाता है और जीवन में जटिलताएं आनी शुरू हो जाती हैं।

इसमें है समझदारी

¯ छोटी-मोटी बातों को लेकर परस्पर अविश्वास की स्थिति पैदा न होने दें। खटास  देर तक और दूर तक बनी रहती है तो अलगाव तक मामला जा पहुंचता है। 
¯ एकदूसरे के महत्व को अच्छी तरह से समझें और जरूरतों को भी पूरा करें।
¯ घरेलू जिम्मेदारियों को तनाव का कारण न बनने दें।
¯ हमेशा समझबूझ से काम लें और समझौतावादी रुख अपनाएं।
¯  जरूरतें कैसे पूरी हों मिलकर सोचें और समस्या का समाधान भी मिलकर ही करने की आदत डालें।
¯ खर्च कभी भी आमदनी से अधिक न करें और बचत जरूर करें।

लगाव को अलगाव तक न जाने दें

पं. महेश शर्मा 

पति-पत्नी सुख हो या दु:ख, दोनों ही स्थितियों में अटूट साथी और सहभागी होते हैं। उनमें सागर से भी गहरा प्यार होता है। यही रिश्ता परिवार का आधार होता है। आपस में अनबन या रूठना स्वाभाविक भी है और जरूरी भी क्योंकि तकरार में ही मनुहार के इजहार का मजा है। छांव का सुख धूप झेलने के बाद ही मिलता है।
कहने से ज्यादा लाभ सहने में है। दो लोगों के बीच या परिवार में कहासुनी और झड़प होना कोई अनहोनी बात नहीं है किंतु यह अनबन दूध में खटाई की तरह न हो। प्यार की मिठास को सदाबहार बनाए रखने के लिए तालमेल हो जाना वैसे ही आवश्यक है जैसे सांसों के लिए ऑक्सीजन। किसी भी बात को मन में गांठ बनाकर रखने से मतभेद मनभेद में बदल जाता है और रिश्तों में दरार पड़ जाती है। घर कलह का अखाड़ा बन जाता है और इसका दुष्प्रभाव मासूम बच्चों पर तो पड़ता ही है दूसरे परिजनों के तनाव का कारण भी बन जाता है। तनाव ज्यादा बढ़ता है तो गृहस्थी की नाव डगमगाने लगती है।

अनबन हो भी जाए तो स्थायी रूप से अनमने न रहें बल्कि फिर प्यार के उसी मुकाम पर पहुंच जाएं। अलगाव को लगाव में बदल जाता है। संबंध पारे की तरह बिखरने तथा दिल से उतरने से बच जाता है। सात जन्मों और सात फेरों वाला रिश्ता सपने में भी टूटने न पाए इसलिए समझ, संयम, समझौता का दायरा कभी न लांघें। आपको अगर झुकाना आता है तो झुकना भी आना ही चाहिए। अहम से बात बिगड़ती है तो हम से बन भी जाती है।  आईने की तरह साफगोई अपनाने से सारे भ्रम, गिले और शिकवे दूर हो जाते हैं। दिल और जुबान में एकरूपता होनी चाहिए ताकि आचरण का दोहरापन संबंधों को खंडित न कर पाए। रिश्ते और ईमानदारी में चोली-दामन का नाता होता है और पति-पत्नी से बढ़कर कोई नजदीकी रिश्ता नहीं होता। हर दंपति को चाहिए कि अपने संबंध की महत्ता समझें क्योंकि अंधावेश कंव पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होता है। बहुत संभलकर बोलें। गोली के घाव भर जाते हैं पर  बोली के घाव कभी नहीं भरते। सुख का मंत्र समझें और सहनशीलता अभेद कवच है यह बात कभी न भूलें।

क्यूं न करें अरेंज मैरिज

पं. महेश शर्मा


समाज में दो प्रकार के विवाह प्रचलन में हैं। पहला परंपरागत विवाह यानी तयशुदा विवाह और दूसरा प्रेम विवाह। परंपरागत विवाह माता पिता की इच्छानुसार संपन्न होता है। जबकि प्रेम विवाह में लड़के लड़कियों की इच्छा और रुचि महत्वपूर्ण होती है।

भारतीय समाज में परंपरागत विवाह सदियों से प्रचलन में है और आज भी इसे ही समाज में अधिमान्यता प्राप्त है। अधिकांश लोगों का आज भी इसी में विश्वास है। लव मैरिज और लिव इन रिलेशन की बात भले ही जारी है पर एक हकीकत इस मामले में देखने को मिल रहा है कि समझदार और योग्य युवक अब फिर से तयशुदा विवाह यानी परंपरागत विवाह को ही प्राथमिकता देने लगे हैं। संभवतः लव मैरिज की परेशानियों की वजह से सफल युवाओं में इस तरह की प्रव2त्ति नये सिरे से देखने को मिल रहा है। ये बात अलग है कि वे करिअर ओरिएंटेड लड़कियों को ही प्राथमिकता देते है पर शादी घरवालों की रजामंदी से ही करना चाहते हैं।

यही वजह है कि परंपरागत विवाह आज भी प्रासंगिक हैं। विवाह का समाज में अस्तित्व का आधार यही है। अभिभावक से लेकर युवक तक ये सोचते हैं कि यही सही परंपरा है। आज मेरे पिता शादी करते हैं। कल हम अपने बंच्चे की शादी इससे भी धूमधाम से करेंगे। यही तो जिंदगी है। यही इतिहास है और ऐसा ही होता है।

अरेंज मैरिज जीवन भर के लिए होता है। इसमें तलाक दर आज भी बहुत कम हैै। भारत में यह आज भी 1.1 प्रतिशत है, जबकि अमेरिका में 45.8 प्रतिशत तलाक दर है। परंपरागत विवाह में तलाक दर कम होने कारण यह माना जा रहा है कि शादी से पहले ही लड़का और लड़की दोनों के परिवार वाले अपने साधनों और जान पहचान के बल पर इस बात की तहकीकात कर लेते हैं कि रिश्ता सही है या नहीं। कम से कम इस मामले में भारतीय समाज में अब भावनाओं से कोई समझौता नहीं करता।

अरेंज्ड मैरिज के गुण

- मूल्य और अपेक्षा को सम्मान मिलना

- लड़कियां कम उम्र की और कम लंबा होना

- लुक की बात है तो एक-दूसरे की बातचीत पर निर्भर है।

- धर्म और जाति, भाषा का एक होना

- खानपान में समानता को ही प्राथमिकता और इस मामले में किसी को बाध्य नहीं किया जाता है। नान वेज और वेज में शादी होते भी है तो सहमति होने के बाद ही।

- पहले लड़कों की योग्यता को वरीयता दी जाती थी अब लड़ंकियों को भी योग्य होना बेहतर माना जाने लगा है।

- व्यवसाय भी आपसी सहमति पर आधारित होते हैं।

बेहतर दाम्पत्य के नुस्खे


पं. महेश शर्मा


बहुत से रिश्तों में खटास सिर्फ इसलिए आ जाती है पति पत्नी मिल बैठकर कुछ मिनट आपस में बात नहीं करते। दोस्तों या रिश्तेदारों की बुराई हो या दफृतर का मुदृदा हल्का फुल्का आपस में बांटने से दिमाग का प्रेशर भी तो कम होता है।


वैसे तो बेहतरीन लाइफ पार्टनर बनने का कोई सटीक नुस्खा अब तक नहीं ढूंढ़ा जा सका है पर रिश्तों में गर्माहट बना रखने और उनको नीरस होने से बचाने के कुछ मामूल से तरीके जरूर हैं, जिनको अपने जीवन में शामिल कर आप भी बन सकते हैं नंबर वन जीवनसाथी।

प्रेमपूर्ण उत्साहजनक तरीके से जीवन भर किसी का साथ निभा पाना कोई हंसी खेल नहीं है। ठीक उसी तरह दांपत्य को हमेशा उकताहट और नीरसता ही नहीं तबाह करती, बल्कि कई दफा लोग रिश्तों में गर्माहट रखने में ही पिछड़ जाते हैं। अगर आप चाहते है बेहतरीन जीवनसाथी साबित होना तो कुछ बातों पर गौर जरूर फरमाएं।

विश्वास करें

किसी भी रिश्ते को बेहतर तरीके से निभाने का मूल मंत्र है, एक-दूसरे पर सौ फीसदी विश्वास करना। किसी तरह का भय या शक दिल में जहां आपने रखा समझिए खुद को आप प्रेम से दूर करते जा रहे हैं। विश्वास टूटने के भय से पहले ही पत्नी पर  शंकालू निगाह रखना, आपको कमजोर करता है। प्रेम तो छूटता ही है, जो चीजें आपके पास होनी थीं, वे भी दूर होती जाती हैं।

स्वीकारें

जिसे आप प्यार करते हैं, उसे संपूर्णता के साथ स्वीकारें। उसकी अच्छाईयों को अपना लेना और कमियों का चुन चुनकर सुबह शाम गिनाते फिरना, आपके प्यार के लिए बिल्कुल अच्छा नहीं है। जो है, जैसा है, उसको भर दीजिए प्यार से। संपूर्णता में प्यार करें। कमियों को कमियों की तरह लेना ही छोड़ दें। क्योंकि कोई भी परफेक्ट नहीं हो सकता। कुछ कमियां तो आपमें भी होंगी। बात चाहे प्यार की हो या काम की, जितना हो सके और जब तक हो सके आपस में एक-दूसरे की तारीफ करें। यह कभी नहीं मानकर बैठ जाएं कि प्रोत्साहन की जरूरत नहीं, क्योंकि हर किसी को बूस्टअप करना नहीं आता। और कोई कितना भी कहे पर हर किसी को तारीफ भाती है। यह बहुत जरूरी है तो बस शुरू हो जाइए। याद रखिए सम्मान देने से ही मिलता है। आप अपने जीवन साथी का सम्मान करेंगे तभी दूसरे भी उसे सम्मानित नजरों से देखेंगे। यदि आपने ही उसके बारे में अनाप शनाप बोलना शुरू कर दिया तो दूसरों को कैसे रोकेंगे। अपनी नाराजगी या नापसंद जरूर बताएं पर यह ख्याल रखें, कि सम्मान को ठेस न पहुंचे।

सलाह लें

कितनी भी अपनी मर्जी चलाने की आदत हो आपकी, बिना रुके या सोचे हर छोटी बड़ी बात पर सलाह लें। विचार शेयर करें। आपको यह पता भी हो कि अमुक मामले में रिएक्शन अलग हो सकता है तो भी आपकी यह जिम्मेदारी बननी है कि आप उनसे पूछें जरूर। फिर अपने तर्क देकर आप वहीं करें जो आपकी मर्जी है पर थोपें नहीं कुछ।

आप कुछ भी क्यों न करते हों, कुछ समय एक-दूसरे को जरूर दें। साथ में बैठक कर टीवी देखें, एक साथ डिनर करें या एक ही बिस्तर पर सो लेने से भावनात्मक नजदीकियां नहीं पनपती। कई रिश्तों में खटास सिर्फ इसलिए आ जाती है कि मिल बैठकर कुछ मिनट बतियाते नहीं। दोस्तों या रिश्तेदारों की बुराई हो या दफृतर की समस्या हल्का फुल्का बांटने से दिमाग का प्रेशर कम होता है और पति पत्नी के रिश्ते को मजबूत बनाता है।

कमजोर पड़ते रिशतों के बंधन

पं. महेश शर्मा


जिस तरह से युवा सामाजिक ताने बाने को समझने में असक्षम साबित हो रहे हैं, उससे तय है कि आने वाले वर्षों में इसका दौर फिर से लौट आएगा।


सामजिक नियंत्रण का प्रयोग विभिन्न अर्थों में होता रहा है। एक सामान्य धारणा है कि लोगों को समूह द्वारा स्वीक2त नियमों के अनुसार आचरण करने के लिए बाध्य करना ही सामाजिक नियंत्रण है, किन्तु यह एक संकुचित धारणा है। प्रारंभ में सामाजिक नियंत्रण का अर्थ केवल दूसरे समूहों से अपने समूह की रक्षा करना और मुखिया के आदेशों का पालन करना मात्र था। बाद में धार्मिक और नैतिक नियमों के अनुसार व्यवहार करने को सामाजिक नियंत्रण माना गया। वर्तमान समय में सामाजिक नियंत्रण का तात्पर्य संपूर्ण व्यवस्था के नियमन से लिया जाता है, जिसका उदृदेश्य सामाजिक आदर्शों को प्राप्त करना है।

यही कारण है कि प्रत्येक समाज में नियंत्रण की व्यवस्था होती है। इसका कारण यह है कि समाज और सामाजिक संबंधों की प्रक2ति, सामाजिक दशाओं एवं व्यक्तिगत व्यवहारों में भिन्नता पाई जाती है। सदस्यों के उदृदेश्यों, हितों एवं विचारों के भिन्न भिन्न होने के कारण एक ही प्रकार के नियंत्रण से सभी के व्यवहारों को नियमित नहीं किया जा सकता। ग्रामीण एवं नगरीय, बंद एवं मुक्त, परंपरात्मक, जनतांत्रिक एवं एकतंत्र समाज में सामाजिक नियंत्रण के स्वरूपों में भिन्नता होना स्वाभाविक है। कभी पुरस्कार के द्वारा तो कभी दंड के द्वारा, कभी औपचारिक व संगठित शक्तियों द्वारा तो कभी अनौपचारिक व असंगठित शक्तियों द्वारा नियंत्रण रखा जाता है।

औपचारिक सामाजिक नियंत्रण राज्य, सरकार या किन्हीं कानूनी संस्थाओं द्वारा गैर कानूनी व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए लागू किया जाता है। इन नियमों का सदस्यों पर बाध्यतामूलक प्रभाव होता है। ऐसा इसलिए कि इन नियमों के पीछे सरकार की ताकत होती है। यही कारण है कि व्यक्ति कानून का उल्लंघन करने से पहले कई बार सोचता है।

दूसरी तरफ अनौपचारिक सामाजिक नियंत्रण का वह प्रकार है जिसमें जनरीतियों, प्रथाओ, परंपराओं, रुढि़यों, आदर्शों, विश्वासों, धर्म एवं नैतिकता आदि के माध्यम से व्यक्तियों एवं समूहों के व्यवहारों को नियंत्रित किया जाता है। इन सामाजिक नियमों का पालन समूह कल्याण को ध्यान में रखकर नैतिक कर्तव्य के रूप में किया जाता है।

यही कारण है कि समाज जैसे जटिल व्यवस्था में व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए अनेक कानून बनाये गए हैं, फिर भी इस वैज्ञानिक युग में आज भी धर्म, प्रथा, परंपरा आदि का अपना विशिष्ट महत्व है। विवाह जैसे मुदृदों पर तो इसका महत्व आज भी काफी ज्यादा है।

हालांकि पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव व लोकतांत्रिक समाज में युवाओं में वैवाहिक संबंधों को लेकर उच्छं2खलता काफी बढ़ी है। आज का युवा किसी भी कायदे कानून को मानने को तैयार नहीं है। यही कारण है कि अब सामजिक नियंत्रण न के बराबर है। इसके बावजूद आज जो परिणाम सामने आ रहे है उससे तत्काल तो लगता है कि वैवाहिक संबंधों को लेकर सामजिक नियंत्रण कमजोर होता जा रहा है, लेकिन इसके दुष्परिणामों को देखकर ऐसा लगता है कि कुछ ही समय बाद एक बार फिर से इस तरह के नियंत्रणों की आवश्यकता लोग खुद महसूस करेंगे।