Tuesday, March 1, 2011

ससुराल गेंदा फूल


  








डीके मिश्र
फिल्म देहली-6 के गाने ससुराल गेंदा फूल.... काफी लोकप्रिय
हुआ। लेकिन इसकी गहराई को बहुत कम लोग जानते हैं। आज
भी इस गाने को गाते ही सभी का मन खुष हो जाता है। षहरी
लोग इसमें प्यार को ढूंढते हैं जबकि इसका रहस्य कुछ और है।
महानगर और बी टाउन सिटी के लोग तो आज भी इस गाने के मर्म
को समझ नहीं पाए हैं। यही कारण है कि षहरवासियों को इसमें
आनंद और प्रेम की खुषी का अहसास तो होता है पर इसकी गहराई
से वह कोसों दूर हैं। दरअसल यहां पर गेंदे के फूल की तुलना
ससुराल से की गई है। संयुक्त परिवार में ससुराल में नव विवाहित
बहू को सास की गालियां, ननद के ताने और देवर के सहानुभूति
जैसे स्थितियों का सामना करना पड़ता है। यह ग्रामीण परिवेष
में रहने वाले या संयुक्त परिवार में रहने वालों के लिए नइ्र्र
बात नहीं है। लेकिन एकल परिवार की अवधारणा की वजह अब इस मर्म से
लोग दूर हो गए हैं।

यही कारण है कि फिल्म के गाने में ससुराल को गेंदा फूल कहा
जाना षहरी युवाओं के लिए कुछ नया और उत्सुकता जगाने वाला
है। यहां पर गीतकार ने रूपक का प्रयोग प्रयोग किया है। गेंदे में
बनावट के लिहाज से ऐसी खासियत है कि इसमें बहुत सारे फूल एक ही
तने से उगते और पलते बढ़ते हैं। ठीक वैसे ही जैसे ससुराल रूपी
तने से सास, ससुर, ननद, देवर जैसे रिष्ते पनपते हैं और साथ साथ फलते
फूलते हैं।

बालीवुड की फिल्म देहली-6 के इस धुन पर संभ्रांत लोग आज
भी झूम उठते हैं। लेकिन इस गाने को लिखने और पहली बार
गाने वाले छत्तीसगढ़ी कलाकार परदे के पीछे रह गए। इस लोकगीत
को 1972 में रायपुर की जोषी बहनों ने गाया था। उनका

कहना है कि रायल्टी न सही, इसमें कम से कम गीतकार का उल्लेख
होना था। रायपुर के लोगों के लिए अपने ही देष के लोकगीत
को बाॅलीवुड द्वारा लेना और कहीं भी उसका जिक्र तक न करना
चैकाने वाला है।

हां, लीरिक्स रायटर के तौर पर प्रसून जोषी का नाम है। गीत को
1972 में गाने का दावा करने वाली जोषी बहनें अब इस कवायद
में हैं कि कम से कम राज्य या बोली का ही उल्लेख हो जाए तो
लोककलाकारों को देषव्यापी मंच मिल सकता है।

इस गीत को सबसे पहले खरोरा में गाया गया था। सास गारी देवे...
गीत स्व. गंगाराम षिवारे ने लिखा था और स्व. भुलवाराम यादव
ने उसे स्वर दिया। इसके बाद यादव ने ही इस फोकसांग को रमादत्त
जोषी व डा. रेखा जोषी और प्रभादत्त को सिखाया। इसके
बाद उन्होंने मिलकर सबसे पहले ये गाना खरोरा गांव में गाया।
जोषी बहनों का कहना है, 70 के दषक के दौरान अधिकतर
गांवों में लाइट नहीं थी, तब मषाल की रोषनी में ये
कलाकार परफार्म किया करते थे। रात का समय चुनने की वजह ये थी
कि उस समय सारे गांव वाले काम से फुरसत पा जाते थे। जोकर पहले
करतब दिखाकर लोगों को जमा करता और फिर सारे कलाकार गाते और
अभिनय करते थे।

इस छत्तीसगढ़ी लोकगीत में बहू की वेदना को उकेरने की
कोषिष है। गीत के बोल का अर्थ है कि षादी होकर आई
नई बहू को सास-ननद और यहां तक कि पड़ोसी भी ताना देते
हैं। ऐसे में हम उम्र देवर ही भाभी का दर्द समझता है और
सबको समझाता है। बहू के माध्यम से गवाए इस गीत में अभिनय भी
वैसा ही हुआ करता था, जिसमें सास-ननद और बहू-देवर सभी
रहते थे। पति के व्यापारी होने के कारण बहू का अकेलापन और
बढ़ जाता था। समूचे गीत में इसी बात का जिक्र है। खैर जो कुछ
हो बाॅलीवुड व षहरी जीवन जीने वाले भारतीय के लिए यह नया जरूर
है जिसमें उन्हें प्यार का अपना स्वांग हमेषा नजर आता रहता है पर

हकीकत संयुक्त परिवार की संस्कति का तानाबाना है।

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